इस्तिकबाले किबला के चन्द मसाइल
पूरी नमाज़ में खानए कअबा की तरफ मुंह करना नमाज की शर्त और जरूरी हुक्म है । लेकिन चन्द सूरतों में अगर किबला की तरफ मुंह न करे फिर भी नमाज़ जाइज़ है ।
मसला : - जो शख्स दरिया में किसी तख्ता पर बहा जा रहा हो और सही अन्देशा हो कि मुंह फेरने से डूब जायेगा इस तरह की मजबूरी से वह किबला की तरफ मुंह नहीं कर सकता तो उसको चाहिए कि वह जिस रुख भी नमाज पढ़ सकता हो पढ़ ले । उसकी नमाज हो जाएगी और बाद में नमाज को दुहराने की भी जरूरत नहीं । ( बहारे शरीअत )
मसला : - बीमार में इतनी ताकत नहीं कि वह किबला की तरफ मुंह कर सके और वहां दूसरा कोई आदमी भी नहीं जो कअबा की तरफ उसका मुंह करा दे तो वह इस मजबूरी की हालत में जिस तरफ भी मुंह करके नमाज पढ़ लेगा उसकी नगाज हो जाएगी । और इस नमाज़ को बाद में दुहराने की भी जरूरत नहीं ।( बहारे शरीअत व रहुल मुहतार )
मसलाः - चलती हुई कश्ती में अगर नमाज पढ़े तो तकबीर तहरीमा के वक़्त किबला की तरफ मुंह करके नमाज शुरू करे और जैसे जैसे कश्ती घूमती जाये खुद भी किबला की तरफ मुंह फेरता रहे चाहे फर्ज नमाज हो या नफ़्ल । ( गुनिया )
मसला : - अगर यह न मालूम हो कि किबला किधर है और वहां कोई बताने वाला भी न हो तो नमाजी को चाहिए कि अपने दिल में सोचे और जिधर किबला होने पर दिल जम जाये उसी तरफ मुंह करके नमाज पढ़ले । उसके हक में वही किबला है । ( मुनयतुलमुसल्ली वगैरह )
मसला : - जिस तरफ दिल जम गया था उधर मुंह करके नमाज़ पढ़ रहा था फिर नमाज ही के दर्मियान में उसकी यह राय बदल गई कि किबला दूसरी तरफ है या उसको अपनी गलती मालूम हो गई तो उस पर फर्ज है कि फौरन ही उधर घूम जाये । और पहले जितनी रकअतें पढ़ चुका है उसमें कोई खराबी नहीं आएगी । इस तरह अगर नमाज में उसको चारों तरफ भी घूमना पड़ा फिर भी उसकी नमाज हो जाएगी और अगर राय बदलते ही या गलती जाहिर होते ही दूसरी तरफ नहीं घूमा और तीन मर्तबा सुबहानल्लाह कहने के बराबर देर लगा दी तो उसकी नमाज न होगी । ( दु मुख्तार व रटुल मुहतार जि . 1 स . 491 )
मसला : - नमाजी ने अगर बिला उज़्र कस्दन जान बूझ कर किबला से सीना फेर दिया तो अगरचे फौरन ही उसने किबला की तरफ सीना फिरा लिया फिर भी उसकी नमाज टूट गई और वह फिर से नमाज़ पढे । और अगर नमाज में बिला कस्द व इरादा किबला से सीना फिर गया और फौरन ही उसने किबला की तरफ सीना फेर लिया तो उसकी नमाज़ होगई । ( मुनयतुलमुसल्ली व बहर )
मसला : - अगर सिर्फ मुंह किबला से फेर लिया और सीना किबला से नहीं फिरा तो उस पर वाजिब है कि वह फौरन ही किबला की तरफ मुंह करले । उसकी नमाज़ हो जाएगी । मगर बिला उज्र एक सेकेन्ड के लिए भी किबला से चेहरा फेर लेना मकरूह है । ( मुनयतुलमुसल्ली ) मसला : - अगर नमाजी ने किबला से न सीना फेरा न चेहरा बल्कि सिर्फ आंखों को फिरा फिरा कर इधर उधर देख लिया तो उसकी नमाज हो जाएगी मगर ऐसा करना मकरूह है |
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